Posted by Nalin Mehra on 11:04 PM

मद्धम मद्धम ही सही मुस्कुराना चाहता हूँ,
थोड़ा सा ही सही पर गम भूलना चाहता हूँ,
चाहत नही मुझे किसी आसमान की,
अपनी हिस्से की बस ज़मीं चाहता हूँ,

ज़िन्दगी हैं अनजान राहों का सफर,
फिर भी इसे अपना जानकर निभाता हूँ,
हजारों अनजान चेहरों के दरमियान ,
बस एक "अपना" सा चेहरा चाहता हूँ,

दर्द और गम तो पाता है हर इंसान,
और मैं भी जुदा नही जानता हूँ,
है गम बांटने वाले भी बहुत,
पर किसी "अपने" के सामने रोना चाहता हूँ,

हूँ आज मैं तनहा इतना की,
कागज़ कलम को हाल-ऐ-दिल बताता हूँ,
बस एक बार देखले मुडके ए ज़िन्दगी,
गुज़रे हुए हर लम्हे को जीना चाहता हूँ,

नलिन .......

11 comments:

tejasbaldev said...

nalin.. this one is a masterpiece..! keep it up..

Rma said...

awesome poetry, keep it up

Rma said...

awesome poetry!! keep it up

Rma said...

awesome poetry!! keep it up

Nalin Mehra said...

thanks RMA and TEJAS for the appreciation.......

sonali said...

Great job.........ye to bata de kiske liye likta hai.?????

Shambhu Choudhary said...

हूँ आज मैं तनहा इतना की,
कागज़ कलम को हाल-ऐ-दिल बताता हूँ,
बस एक बार देखले मुडके ए ज़िन्दगी,
गुज़रे हुए हर लम्हे को जीना चाहता हूँ,
sunder rachna

Jatin said...

beautiful poetry brother , keep it up.

mamraj said...

sir,

very beautiful poetry ,I like very much it

Pragya Gupta said...

amazing... dil ko sukoon dene wali :)

Nalin Mehra said...

thank you @pragya.......

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